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Thursday, 29 October 2026
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उत्तम कुमार: बांग्ला सिनेमा के महानायक की यात्रा

मुंबई, सितंबर 2: उत्तम कुमार एक ऐसा नाम है जो बांग्ला सिनेमा के सुनहरे युग को जीवित करता है, जहां उनकी स्क्रीन पर उपस्थिति दर्शकों के लिए एक विशेष अवसर से कम नहीं थी। चाहे वह रोमांस हो, गंभीर कहानी कहने का काम हो या भावनात्मक भूमिकाएं, उत्तम कुमार ने हर शैली में एक अनोखी पहचान बनाई। आज भी, उन्हें बांग्ला सिनेमा के सबसे महान सितारों में से एक माना जाता है, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘महानायक’ कहा जाता है। हालाँकि, इस शिखर तक पहुँचने की उनकी यात्रा आसान नहीं थी, क्योंकि उन्हें कभी ‘फ्लॉप मास्टर जनरल’ के रूप में लेबल किया गया था।

उत्तम कुमार का जन्म 3 सितंबर 1926 को कोलकाता (तब के कलकत्ता) में हुआ। उनका असली नाम अरुण कुमार चट्टोपाध्याय था। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने कलकत्ता पोर्ट ट्रस्ट में काम किया, लेकिन अभिनय के प्रति उनके जुनून ने उन्हें थिएटर की ओर आकर्षित किया, जहां से वे फिल्मों की ओर बढ़े। उन्होंने 1948 में फिल्म ‘दृष्टिदान’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की, लेकिन उनके शुरुआती काम दर्शकों के साथ नहीं जुड़े, जिससे उन्हें ‘फ्लॉप मास्टर जनरल’ का दुर्भाग्यपूर्ण टैग मिला।

इन बाधाओं के बावजूद, उत्तम कुमार ने हार नहीं मानी और 1952 में फिल्म ‘बासु परिवार’ के साथ अपनी पहली बड़ी सफलता हासिल की। उनके करियर में मोड़ 1953 में ‘साढ़े चौरासी’ के साथ आया, जहां उनकी जोड़ी सुचित्रा सेन के साथ बेहद लोकप्रिय हुई, जिसने बांग्ला सिनेमा के सबसे आइकोनिक जोड़ों में से एक को स्थापित किया। इसके बाद ‘अग्नि परीक्षा’ ने उन्हें एक प्रमुख रोमांटिक हीरो के रूप में स्थापित किया।

उत्तम कुमार ने ‘शापमोचन’, ‘सागरिका’, ‘हरानो सुर’, ‘इंद्राणी’, ‘सप्तपदी’, ‘बिपाशा’, ‘दिया नेया’, और ‘चिड़ियाखाना’ जैसी फिल्मों में भी अपनी चमक बिखेरी। उनकी सुचित्रा सेन के साथ की गई फिल्में विशेष रूप से दर्शकों के दिलों को छू गईं, जिसके परिणामस्वरूप उनके कई सफल फिल्में बनीं। उनके करियर में एक महत्वपूर्ण योगदान 1966 में सत्यजीत रे की फिल्म ‘नायक’ था, जिसमें उन्होंने एक फिल्म स्टार की भूमिका निभाई, जो एक ग्लैमरस बाहरी रूप के पीछे छिपी समस्याओं से जूझ रहा था। यह भूमिका उनकी सबसे यादगार प्रदर्शनों में से एक मानी जाती है।

उन्होंने सत्यजीत रे के साथ ‘चिड़ियाखाना’ में भी काम किया, जिसमें उनकी अभिनय क्षमता के लिए राष्ट्रीय पहचान मिली। 1968 में, उन्हें ‘एंथनी फिरंगी’ और ‘चिड़ियाखाना’ में उनके प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला, साथ ही फिल्मफेयर और बंगाल फिल्म पत्रकार संघ से कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए।

1970 का दशक उत्तम कुमार के लिए एक और महत्वपूर्ण दशक साबित हुआ, जहां उन्होंने ‘अमानुष’, ‘सन्यासी राजा’, ‘अग्निश्वर’, ‘मौचाक’, ‘बाघ बंधी खेला’, ‘सव्यसाची’, और ‘आनंद आश्रम’ जैसी फिल्मों में विविध भूमिकाएं निभाईं। उम्र बढ़ने के बावजूद, दर्शकों के बीच उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई।

उत्तम कुमार का निधन 24 जुलाई 1980 को 53 वर्ष की आयु में फिल्म ‘ओगो बधु सुंदरि’ की शूटिंग के दौरान हुआ। उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन दुर्भाग्यवश, उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनकी अंतिम यात्रा में प्रशंसकों की भारी भीड़ ने सड़कों पर आकर उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दी।

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