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Friday, 30 October 2026
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किशोर अपराधों की रोकथाम के लिए कानूनी शिक्षा और मनोवैज्ञानिक परामर्श आवश्यक: विशेषज्ञों का मत

उदयपुर, जुलाई 16: पैसिफिक यूनिवर्सिटी के पैसिफिक स्कूल ऑफ लॉ ने “क्या गंभीर अपराधों के लिए आरोपित किशोरों का वयस्कों की तरह मुकदमा चलाना चाहिए?” विषय पर एक समूह चर्चा का आयोजन किया। इस चर्चा में विधि विद्यालय के शिक्षकों ने इस मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष में तर्क प्रस्तुत किए।

सभा को संबोधित करते हुए डीन इन-चार्ज अनुराग मेहता ने कहा कि किशोर अपराध जैसे संवेदनशील मुद्दे को केवल भावनात्मक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। उन्होंने न्याय और मानवता के बीच संतुलन बनाए रखते हुए कानूनी, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलुओं को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया।

विशेषज्ञों ने प्रस्तुत किए विविध दृष्टिकोण

मनोज जोशी ने कहा कि गंभीर अपराधों के पीड़ितों के लिए समय पर न्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि कानून का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं है, बल्कि कानूनी प्रणाली में जनता का विश्वास बनाए रखना भी है।

मंजू कुमावत ने कहा कि किशोर अभी भी मानसिक और भावनात्मक विकास के दौर से गुजर रहे हैं, इसलिए उनके मामलों में सुधारात्मक और पुनर्वास आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

पूजा सिसोदिया ने किशोर अपराध की रोकथाम में परिवारों, स्कूलों और समाज की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर किया। उन्होंने कहा कि समय पर मार्गदर्शन और नैतिक शिक्षा के माध्यम से कई अपराधों को रोका जा सकता है।

ध्रुवल शाह ने कहा कि यदि कोई किशोर गंभीर और घृणित अपराध करता है, तो प्रत्येक मामले का आकलन मानसिक परिपक्वता, अपराध की प्रकृति और आस-पास के हालात के आधार पर किया जाना चाहिए।

चर्चा के दौरान प्रतिभागियों ने भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया में किशोर न्याय प्रणाली की तुलनात्मक समीक्षा भी प्रस्तुत की।

जागरूकता, परामर्श और कानूनी शिक्षा पर जोर

भानुप्रिया कुमावत ने स्कूलों में नियमित मनोवैज्ञानिक समर्थन और परामर्श की आवश्यकता पर जोर दिया, यह कहते हुए कि मानसिक स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देना आवश्यक हो गया है।

कृपा जैन ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को कानून की जानकारी होनी चाहिए और समाज में कानूनी प्रावधानों का सम्मान बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

परवीन कौरसर के अनुसार, न्याय प्रणाली का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं है, बल्कि उन्हें सुधारना और समाज में पुनः एकीकृत करना भी है।

निशित गोखरू ने कहा कि गंभीर अपराधों के मामलों में पीड़ितों के अधिकारों और न्याय की डिलीवरी को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

चिराग भटनागर ने कहा कि कड़े कानूनों के साथ-साथ कानूनी जागरूकता, नैतिक मूल्य और सामाजिक जिम्मेदारी को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवारों, स्कूलों और समाज को मिलकर बच्चों में अनुशासन, संवेदनशीलता, नैतिक मूल्य और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित करने के लिए काम करना चाहिए।

चर्चा का निष्कर्ष यह निकला कि अपराध की रोकथाम के लिए स्कूल स्तर पर कानूनी शिक्षा को लागू करना एक प्रभावी तरीका है। प्रतिभागियों ने कहा कि छात्रों को प्रारंभिक उम्र से ही कानून, अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए ताकि वे कानून का सम्मान करना सीखें और आपराधिक गतिविधियों की ओर न बढ़ें।

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