
–बाद की गैर पंजीकृत वसीयत साबित करने में नाकामी बनी वजह
–ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील खारिज
Prayagraj, 29 दिसम्बर (Udaipur Kiran) . इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बाद में भतीजों के नाम की गई गैर पंजीकृत वसीयत को अमान्य कर पहले की बेटियों के नाम की गई पंजीकृत वसीयत को मान्य ठहराने के अधीनस्थ अदालत के आदेश को सही करार दिया है और फैसले के खिलाफ दाखिल प्रथम अपील खारिज कर दी.
यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन ने वाराणसी के नवाबगंज क्षेत्र में स्थित एक आवासीय मकान और अन्य सम्पत्तियों के उत्तराधिकार को लेकर विवाद पर अपना निर्णय सुनाया. ट्रायल कोर्ट ने पिता द्वारा अपनी बेटी के पक्ष में की गई पंजीकृत वसीयत को वैध और बाद में भतीजों के पक्ष में दिखाई गई दूसरी वसीयत को संदिग्ध’ करार दिया गया था. जिसे चुनौती दी गई थी.
यह मामला परमानंद लाल श्रीवास्तव की सम्पत्तियों से जुड़ा है, जिनका निधन 22 नवम्बर 2002 को हुआ था. विवाद दो अलग-अलग वसीयतों को लेकर था. पहली वसीयत 20 सितम्बर 1996 को किया गया. यह एक पंजीकृत वसीयत थी, जिसे परमानंद लाल ने अपनी बेटी सुधा श्रीवास्तव और अपनी दूसरी बेटी (दिवंगत) के बेटों के पक्ष में निष्पादित किया था.
वहीं दूसरी वसीयत 25 मई 2002 में की गई. यह एक अपंजीकृत वसीयत थी, जिसे मृतक के भतीजे राकेश श्रीवास्तव और अन्य ने पेश किया था. उनका दावा था कि परमानंद लाल ने अपनी पिछली वसीयत रद्द कर दी थी और सम्पत्तियां उनके नाम कर दी थीं.
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद भतीजों द्वारा पेश की गई 2002 की वसीयत को संदिग्ध माना. और कहा वे साबित करने में विफल रहे. कोर्ट ने पाया कि वसीयत के मुख्य पैरोकार राकेश श्रीवास्तव ने वसीयत तैयार होने के स्थान के बारे में अलग-अलग समय पर विरोधाभासी बयान दिए. कभी उन्होंने कहा कि यह कचहरी में बनी, तो कभी कहा कि यह घर पर तैयार हुई.
कोर्ट ने यह भी पाया कि पिता की मृत्यु के बाद जब भतीजों ने राजस्व अदालत में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन दिया, तो उन्होंने इस 2002 वाली वसीयत का कोई जिक्र नहीं किया था. उन्होंने विरासत के आधार पर दावा किया था, जिससे यह संकेत मिलता है कि वसीयत उस समय अस्तित्व में ही नहीं थी. कोर्ट ने वसीयत के गवाह लालजी के बयानों पर भी संदेह जताया. यह भी सामने आया कि राकेश श्रीवास्तव ने लालजी की पत्नी के पक्ष में जमीन की रजिस्ट्री की थी, जिससे गवाह के ‘हितबद्ध’ होने की संभावना बनी. वसीयत के समय परमानंद लाल लगभग 83 वर्ष के थे और कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण बिस्तर पर थे. ऐसे में उनके द्वारा खुद वसीयत टाइप करने का दावा अव्यावहारिक लगा.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी वसीयत के निष्पादन के आसपास संदिग्ध परिस्थितियां हों, तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी उसे पेश करने वाले पक्ष की होती है. इस मामले में भतीजे उन संदेहों को दूर करने में विफल रहे. कोर्ट ने राकेश श्रीवास्तव और अन्य की अपीलों को खारिज कर दिया और सुधा श्रीवास्तव के पक्ष में प्रोबेट देने के ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि की.
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(Udaipur Kiran) / रामानंद पांडे