सीएसए के वैज्ञानिकों ने विकसित की गेहूं की के-1910 व के-1905 प्रजाति

फोटो क्रेडिट - सीएसए
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कानपुर, 30 दिसम्बर (Udaipur Kiran) . विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने गेहूं की के-1910 एवं के-1905 को विकसित किया है. यह प्रजातियां ऊसर भूमियों में बढ़िया पैदावार देती हैं तथा भूरा, पीला व काला रस्ट के प्रति अवरोधी है. इसमें कीटों के हमले का प्रभाव कम पड़ता है. ये प्रजातियां 125 से 130 दिन में पक कर तैयार हो जाती है और एक हेक्टेयर जमीन में औसत 35 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार देती है. यह बातें मंगलवार को सीएसए के निदेशक शोध डॉ आरके यादव ने कही.

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) कानपुर के वैज्ञानिकों ने ऊसरीली दशा में सिंचित समय से बुवाई के लिए गेहूं की नई प्रजातियां विकसित की हैं. आज लखनऊ कृषि भवन में हुई राज्य बीज विमोचन समिति की बैठक में सीएसए की तीन प्रजातियों को हरी झंडी दिखाई गई. प्रजातियां विकसित करने में डॉ. आरके यादव, डॉ. सोमवीर सिंह, डॉ. पीके गुप्ता, डॉ. विजय कुमार यादव, ज्योत्सना की भूमिका रही. विश्वविद्यालय के कुलपति के विजयेंद्र पांडियन ने प्रजातियों को विकसित करने वाले सभी वैज्ञानिकों को बधाई दी है.

विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक डॉ. महक सिंह ने बताया कि गौरव सरसों की यह किस्म विशेष रूप से विलम्ब से बुवाई के लिए उपयुक्त है और इसे पूरे Uttar Pradesh के लिए संस्तुत किया गया है. यह प्रजाति लगभग 120 से 125 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और औसतन 18 से 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने में सक्षम है.

उन्होंने बताया कि यह किस्म रोगों के प्रति प्रतिरोधी है तथा इस पर कीटों का प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम पड़ता है, जिससे किसानों की लागत घटती है. इसके दानों का आकार बड़ा होता है और इसमें 39.6 प्रतिशत तक तेल की मात्रा पाई जाती है, जो इसे व्यावसायिक दृष्टि से भी लाभकारी बनाती है.

(Udaipur Kiran) / रोहित कश्यप

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