आत्मAttachment, नफरत, ईर्ष्या और आलोचना से ऊपर उठें: कैलाश मानव

उदयपुर, अगस्त 18: “अपने से अपनी बात भोलेनाथ के साथ” कार्यक्रम के तहत आयोजित शिव कथा के दौरान एक आध्यात्मिक और भक्ति का माहौल बना रहा, जो नारायण सेवा संस्थान के सेवा महातिर्थ बाड़ी परिसर में हुआ.

व्यास पीठ से, संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने सृष्टि के पहले मनुष्य मैनु और माता के रूप में शतरूपा की तपस्या की प्रेरक कथा सुनाई, साथ ही सृष्टि के विस्तार, दक्ष और माता जगदंबा से जुड़े प्रसंगों का वर्णन किया. ये आध्यात्मिक प्रसंग दिव्यांगजनों और उनके परिवारों के दिलों को छू गए, जो देशभर से आए थे.

कैलाश मानव ने किया शिव पूजा

कथा के दौरान, संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष कैलाश मानव ने भी कार्यक्रम में भाग लिया. उन्होंने भगवान शिव की पारंपरिक पूजा की और भक्तों का अभिवादन किया.

उन्होंने उन दानदाताओं के प्रति आभार व्यक्त किया जिन्होंने नारायण सेवा संस्थान के सेवा यात्रा में, पिंडवाड़ा के कठिन समय से लेकर वर्तमान तक, समर्थन किया.

कैलाश मानव ने कहा कि भगवान शिव बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि दिल की सच्चाई और सेवा की छोटी भावना से प्रसन्न होते हैं. उन्होंने कहा कि सेवा के प्रति समर्पित दृष्टिकोण भगवान शिव की सच्ची पूजा है.

‘बलिदान की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए’

कैलाश मानव ने कहा कि लोगों को बलिदान की प्रथा स्वयं से शुरू करनी चाहिए, न कि दूसरों से इसकी अपेक्षा करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि आत्मAttachment, नफरत, ईर्ष्या, अहंकार और आलोचना जैसी प्रवृत्तियों को छोड़ना और मन को शुद्ध करना आध्यात्मिक अभ्यास का सार है.

उन्होंने कहा कि किसी दूसरे व्यक्ति के दुख को अपने दुख के रूप में लेना और उनके जीवन में राहत लाना भगवान की सच्ची सेवा है. जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाना ही सच्ची सेवा है, उन्होंने जोड़ा.

धैर्य, करुणा और सेवा का संदेश

कथा के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से, प्रशांत अग्रवाल ने समझाया कि भगवान शिव सरलता, करुणा और समता का प्रतीक हैं. उन्होंने कहा कि शिव कथा लोगों को सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, बलिदान और परोपकार की भावना को नहीं छोड़ना चाहिए.

भक्तों ने भक्ति भाव से कार्यक्रम में भाग लिया और शिव भजन गाए. परिसर “हर हर महादेव” के जयकारों से गूंज उठा, जिससे एक गहरा आध्यात्मिक वातावरण बना.

प्रशांत अग्रवाल ने भक्तों से अपील की कि पूजा केवल मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि उनके व्यवहार और कार्यों में भी परिलक्षित हो. उन्होंने कहा कि जब दिल में करुणा, वाणी में मिठास और कार्यों में सेवा होती है, तब जीवन स्वयं शिव की भावना से भरा होता है.

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