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Thursday, 29 October 2026
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साहित्य को ये चुप्पियाँ तोड़नी होंगी : अशोक वाजपेयी

नेशनल लिटरेचर ड्रामा फेस्टिवल
नेशनल लिटरेचर ड्रामा फेस्टिवल

जयपुर, 14 दिसंबर (Udaipur Kiran) । कवि, लेखक, चिंतक और विचारक अशोक वाजपेयी ने कहा कि आज के हिंसा, नफ़रत और विद्रूपताओं से भरे भयावह समय में लेखक और साहित्य की खामोशी हमारी कायरता को उजागर करती है। वे पिंक सिटी प्रेस क्लब में पिंकसिटी लिट्रेचर ड्रामा फेस्टिवल के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि यह विचार करने का समय है कि क्या आज का साहित्य सच बोलने का साहस कर रहा है। बंटवारे से लेकर अब तक हिंदू–मुस्लिम प्रश्न पर साहित्य की चुप्पी रही है। गुजरात में 2002 के सांप्रदायिक दंगों पर गुजराती साहित्य खामोश रहा, तो कश्मीर में पंडितों के रक्तपात और पलायन पर कश्मीरी साहित्य मौन साधे रहा। साहित्य की ये चुप्पियाँ इस घनघोर अंधेरे को और गहरा कर रही हैं।

अशोक वाजपेयी ने कहा कि आज गाली–गलौज और झगड़ा–फ़साद की राजनीति का दौर है। यह भाषा के दैनिक विद्रूपण का समय है। हिंदी नफ़रत की राजभाषा बनती जा रही है और दृश्य माध्यमों ने इस प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया है। उन्होंने कहा कि विचार, ज्ञान और असहमति के अपमान की एक नई संस्कृति विकसित हो रही है, जिसमें साहित्य और कलाओं जैसे संस्कृति के सर्जनात्मक रूपों की उपेक्षा हो रही है।

अपने उद्बोधन में उन्होंने वर्तमान समय की सांस्कृतिक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज का समय “अधिकता और अभाव”—दोनों से भरा है। लोग लगातार बोल रहे हैं, लेकिन संवाद कहीं खो गया है। प्रश्न पूछने वाले कम होते जा रहे हैं, जबकि उत्तर देने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।

उन्होंने कहा कि निजी और सार्वजनिक जीवन के बीच की रेखा मिटती जा रही है, संस्कृति सत्वहीन हो रही है और साहित्य व कलाओं की उपेक्षा ही आज की संस्कृति बनती जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब साहित्य का मूल स्वभाव सच बोलना है, तो आज वह चुप क्यों है? हम लोकप्रियता और सार्थकता के बीच उलझकर रह गए हैं। संस्कृतिक कलाएँ विचार और आलोचना के बिना विकसित हो रही हैं।

उन्होंने पत्रकारिता की भी कलाओं के प्रति जिम्मेदारी रेखांकित की। वक्तव्य के बाद श्रोताओं ने उनकी कविताओं का भी रसास्वादन किया।

पत्रकारिता और एआई : कहानी कहने का नया दौर

मुख्य सभागार में दिन का पहला सत्र “पत्रकारिता और एआई : कहानी कहने का नया दौर” विषय पर आयोजित हुआ। सत्र में पीटीआई के मुख्य डिजिटल संपादक प्रत्यूष रंजन, पंजाब केसरी के स्टेट डिजिटल हेड विशाल सूर्यकांत तथा दैनिक भास्कर के स्टेट वीडियो हेड, विज्ञापन विशेषज्ञ और कंटेंट आलोचक संजय छबड़ा ने भाग लिया।

प्रत्यूष रंजन ने कहा कि एआई का उपयोग करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि एआई क्या है और क्यों है। एआई की बुनियादी समझ के बिना कोई पत्रकार नहीं बन सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई एक सहायक हो सकता है, लेकिन समाचार बनाना अंततः पत्रकार का ही काम है। एआई एक डेटा बेस है और उसके तथ्यों की जांच करना पत्रकार की जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम के दौरान पत्रकारिता, विज्ञापन, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रभाव पर विस्तृत विमर्श हुआ।

इस सत्र में अमित शर्मा ने प्रश्न उठाया कि जब–जब मीडिया पर सवाल खड़े हुए, तब–तब सोशल मीडिया को डायवर्जन के रूप में आगे बढ़ाया गया। उन्होंने कहा कि यह जानना बेहद ज़रूरी है कि कौन–सा कंटेंट एआई से बना है और कौन–सा नहीं, अन्यथा लोग आसानी से ठगे जा सकते हैं।

विज्ञापन विशेषज्ञ संजय छबड़ा ने कहा कि एआई का उपयोग विज्ञापन की दुनिया में तेज़ी से बढ़ रहा है और यह स्टोरी–टेलिंग को रिप्लेस कर रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि एआई एक ओर अवसर है, तो दूसरी ओर विघटन भी पैदा कर रहा है।

प्रत्यूष रंजन ने एआई को “सुंदर और खतरनाक”—दोनों बताते हुए कहा कि एआई को इस तरह बनाया गया है कि वह हर सवाल का जवाब देता है, चाहे उसके पास सही जानकारी हो या नहीं। इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि एआई जो उत्तर दे रहा है, उसका स्रोत क्या है। यदि डेटाबेस बायस्ड है, तो आउटपुट भी बायस्ड होगा।

उन्होंने कहा कि प्रॉम्प्ट देना सीखना एक बेसिक स्किल है, लेकिन उससे भी अधिक ज़रूरी यह समझना है कि एआई जो कंटेंट बना रहा है, वह कहां से लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि रियल–टाइम न्यूज़ कवरेज में एआई तब तक उपयोगी नहीं है, जब तक पत्रकार के पास मूल कंटेंट और फील्ड रिपोर्टिंग मौजूद न हो।

इंडिया बनाम भारत : अर्थशास्त्र, वित्त और अनुभव

विचार–सत्र “इंडिया बनाम भारत” में अर्थ, समाज और समकालीन भारत पर गंभीर और बहुआयामी संवाद देखने को मिला। सत्र में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री प्रो. सुरेश देमन, वित्त विशेषज्ञ सुनील दत्त गोयल, चार्टर्ड अकाउंटेंट रजनीश सिंह और सतीश पुनिया ने अपने विचार साझा किए।

प्रो. सुरेश देमन ने कहा कि “इंडिया बनाम भारत” केवल नामों का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संरचना को समझने का संकेत है। उन्होंने जीडीपी को विकास का अपर्याप्त मापदंड बताते हुए कहा कि औसत आधारित गणनाएँ असमानताओं को छुपा देती हैं। बीते 25 वर्षों में लग्ज़री और पूंजी–प्रधान क्षेत्रों का विस्तार हुआ है, जबकि कृषि और श्रम–आधारित क्षेत्रों में अपेक्षित वृद्धि नहीं दिखती।

सुनील दत्त गोयल ने बैंकिंग सुधारों, डिजिटल भुगतान और शेयर बाजार की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बाजार किसी एक सरकार से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विश्वास और उत्पादन से संचालित होता है।

रजनीश सिंह ने कर–व्यवस्था की सीमाओं पर बात करते हुए कहा कि प्रत्यक्ष कर प्रणाली सीमित करदाताओं पर निर्भर है, जबकि अप्रत्यक्ष करों का बोझ आम उपभोक्ता पर अधिक पड़ता है।

सतीश पुनिया ने टैक्सेशन प्रणाली को सरल और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

रील के जादूगर : नया खेल, नई कहानी

डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया की बदलती दुनिया पर आधारित सत्र “रील के जादूगर : नया खेल, नई कहानी” प्रश्न–उत्तर संवाद के रूप में आयोजित हुआ। फाइनेंस, क्रिप्टो, फूड, ट्रैवल और सिटी ब्लॉगिंग से जुड़े कंटेंट क्रिएटर्स ने अपने अनुभव साझा किए।

वक्ताओं ने कहा कि दर्शकों का भरोसा ही किसी क्रिएटर की सबसे बड़ी पूंजी है। वायरल होने से अधिक ज़रूरी ईमानदार अनुभव साझा करना है।

क्रिप्टोकरेंसी पर चर्चा के दौरान लालच और बिना शोध निवेश को सबसे बड़ा खतरा बताया गया।

सोशल मीडिया से कमाई पर वक्ताओं ने कहा कि यह त्वरित सफलता का माध्यम नहीं है। स्थिर आय के लिए धैर्य, समय और भरोसे की आवश्यकता होती है।

पत्रकारिता और सोशल मीडिया के संबंध पर चिंता जताते हुए कहा गया कि एआई और शॉर्ट–फॉर्म कंटेंट के दौर में अधूरी जानकारी तेज़ी से फैल रही है, ऐसे में जिम्मेदार पत्रकारिता और संवेदनशील कंटेंट क्रिएशन और भी ज़रूरी हो गया है।

इस कार्यक्रम के दौरान चिराग मोदी ने पत्रकारिता से जुड़े मुद्दों को रैप के माध्यम से प्रस्तुत किया, वहीं मंजर बैंड की प्रस्तुति ने श्रोताओं को संगीत से बाँध दिया।

पिंक सिटी प्रेस क्लब परिसर में आयुर्वेदिक तीन दिवसीय आयोजन साहित्य, संस्कृति, मीडिया और तकनीक के बीच संतुलन और संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए संपन्न हुआ।

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(Udaipur Kiran)

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