मुंबई में मराठी मानुष की अस्मिता पर संकट: 25 वर्षों बाद भी नहीं मिली आर्थिक और सामाजिक प्रगति

Mumbai | 08 जनवरी 2026। देश की आर्थिक राजधानी Mumbai (मुंबई) का विकास मराठी भाषी समाज के संघर्ष और संयुक्त Maharashtra आंदोलन में शहीद हुए 106 वीरों के बलिदान से संभव हुआ। लेकिन आज उसी Mumbai में मराठी समुदाय (Marathi Manush) के अस्तित्व और अस्मिता (identity) पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं, जो चिंता का विषय हैं।
करीब 25-30 वर्षों तक BMC – Brihanmumbai Municipal Corporation (मुंबई महानगरपालिका) पर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना की सत्ता रही। इस लंबे शासनकाल में यह सवाल उठता है कि मराठी समाज ने कितना विकास किया या उसकी स्थिति और कमजोर हुई? यह प्रश्न आज आम मराठी नागरिकों के बीच खुलेआम पूछा जा रहा है।
एक समय लालबाग, परेल, शिवड़ी, दादर और गिरगांव मुंबई के ‘हृदय’ कहे जाते थे। ये इलाके मिल मजदूरों की मेहनत और मराठी संस्कृति की गहरी जड़ों से विकसित हुए थे। लेकिन पिछले ढाई दशकों में यहां तीव्र cosmopolitan urbanisation (शहरीकरण) हुआ और मिलों की चिमनियां बंद होकर कांच के ऊंचे टावरों में बदल गईं।
इस बदलाव का सबसे बड़ा नुकसान मराठी समुदाय को हुआ। तत्कालीन पालिका सरकार ने टावरों के निर्माण के दौरान वादा किया था कि “मराठी लोगों को वहीं आवास मिलेगा”, लेकिन वास्तविकता इससे भिन्न रही।
मिल कामगारों के आवास और पुनर्विकास योजनाओं के तहत मराठी परिवार दक्षिण और मध्य Mumbai से विस्थापित होकर विरार, कर्जत, कसारा और बदलापुर जैसे बाहरी इलाकों में बसने को मजबूर हुए। जिन ‘मराठी मानुष’ के नाम पर राजनीति हुई, वे धीरे-धीरे मुंबई के नक्शे से गायब होते जा रहे हैं।
किसी भी समाज की प्रगति का आधार economic empowerment (आर्थिक सशक्तिकरण) होता है। बीएमसी का वार्षिक बजट ₹50,000 करोड़ से अधिक है और 25 वर्षों में यह रकम लाखों करोड़ तक पहुंच चुकी है। सवाल यह है कि इस दौरान कितने मराठी उद्यमी या ठेकेदार वास्तव में उभर पाए?
आरोप हैं कि सड़क, नाला सफाई और पुल निर्माण जैसी tender process (टेंडर प्रक्रिया) में स्थानीय मराठी युवाओं को प्राथमिकता देने के बजाय, सीमित प्रभावशाली समूहों को ही लाभ पहुंचाया गया। यदि पालिका की सत्ता मराठी हितों के लिए थी, तो आज मुंबई के शीर्ष ठेकेदारों की सूची में मराठी नाम क्यों नहीं दिखते?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस दौर में मराठी समाज को वड़ापाव और भजी जैसे छोटे व्यवसायों तक सीमित रखा गया, जबकि बड़े आर्थिक नियंत्रण कुछ गिने-चुने लोगों के हाथों में रहे।
चुनावों के दौरान “‘मराठी मानुष’, ‘मराठी अस्मिता’ और ‘मुंबई पर हमला’” जैसे नारे तो जोरदार लगाए गए, लेकिन सत्ता में रहकर ये नारे ठोस अवसरों में नहीं बदले — ऐसी आलोचनाएं तेज हो रही हैं।
मनपा के मराठी माध्यम के स्कूलों की स्थिति इसका उदाहरण है। जहां मराठी स्कूल बंद हुए और छात्रों की संख्या घट गई, वहीं English medium schools (अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल) का तेजी से विस्तार हुआ। आरोप है कि मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाने के बजाय केवल चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया।
आज मुंबई में काम करने वाले मराठी कर्मचारी रोजाना 4-5 घंटे local train commute (स्थानीय ट्रेन यात्रा) करते हैं। ठाणे, पालघर और रायगढ़ से आने वाले ये लोग शहर की सेवा करते हैं, लेकिन शहर में रहने का सपना उनके लिए दूर होता जा रहा है। किफायती आवास की कोई ठोस योजना लागू नहीं हुई; पुनर्विकास से बिल्डरों को लाभ मिला, जबकि मूल निवासी विस्थापित होते गए।
अब जब BMC Elections (मुंबई महानगरपालिका चुनाव) का माहौल है और सत्ता गंवाने का खतरा दिख रहा है, तो फिर से ‘मराठी मानुष के संरक्षक’ होने के दावे किए जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या मतदाता पुराने आश्वासनों पर भरोसा करेंगे? मराठी मतदाता आज बच्चों के भविष्य, रोजगार और आवास के अधिकारों का हिसाब मांग रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 25 वर्षों की सत्ता के बावजूद मराठी समुदाय की समग्र प्रगति सुनिश्चित नहीं हो पाई। मराठी युवाओं की आवाज़ स्पष्ट है — केवल भावनात्मक भाषणों से जीवन नहीं चलता।
घटती मराठी आबादी केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक विफलता का संकेत है। मुंबई पर अधिकार जताने के बावजूद मराठी समाज की अपेक्षित स्थिति न बन पाना आगामी चुनावों में निर्णायक मुद्दा बन सकता है।



