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Thursday, 29 October 2026
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अरावली के मानदंड कांग्रेस शासन में तय, 2003 में गहलोत ने ही जारी किए थे जिलेवार नक्शे :  राजेंद्र राठौड़

अरावली के मानदंड कांग्रेस शासन में तय, 2003 में गहलोत ने ही जारी किए थे जिलेवार नक्शे :  राजेंद्र राठौड़

जयपुर, 21 दिसंबर (Udaipur Kiran) । भाजपा प्रदेश कार्यालय में पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि अरावली पर्वतमाला को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार पर लगाए जा रहे आरोप भ्रामक और तथ्यहीन हैं। उन्होंने कहा कि अरावली हिल्स को लेकर 100 मीटर ऊंचाई का मानदंड कांग्रेस शासनकाल में ही तय हुआ था और 2003 में जिलेवार नक्शे जारी करने के निर्देश भी अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते दिए गए थे।

राठौड़ ने कहा कि अरावली से जुड़े सभी फैसले राजनीतिक नहीं,बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के तहत लिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को अरावली संरक्षण व खनन नियमन को लेकर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया। इससे पहले 8 अप्रैल 2005 को भी 100 मीटर से अधिक ऊंचाई को ‘हिल’ मानने का मापदंड तय किया गया था, जिसका कांग्रेस सरकारों ने वर्षों तक पालन किया।

उन्होंने बताया कि अरावली क्षेत्र का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा अभयारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों और आरक्षित वनों में आता है, जहां खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है। शेष क्षेत्र में भी केवल करीब 2.56 प्रतिशत हिस्सा ही सीमित और कड़े नियमों के तहत खनन के दायरे में है। वर्तमान में 37 जिलों में कुल भौगोलिक क्षेत्र का मात्र 0.19 प्रतिशत हिस्सा ही वैध खनन पट्टों के अंतर्गत है।

राठौड़ ने “90 प्रतिशत अरावली समाप्त होने” के दावे को पूरी तरह असत्य बताया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार जब तक अरावली का वैज्ञानिक मैपिंग और सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान तैयार नहीं हो जाता, तब तक कोई नया खनन पट्टा जारी नहीं किया जा सकता। 100 मीटर का मानदंड केवल ऊंचाई तक सीमित नहीं, बल्कि ढलानों और दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर क्षेत्र को भी खनन से बाहर रखता है, जिससे नियम और सख्त हुए हैं।

उन्होंने ‘सेव अरावली’ अभियान को राजनीतिक दिखावा बताते हुए कहा कि खुद कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का इसमें समर्थन नजर नहीं आता। राठौड़ ने कहा कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव भी स्पष्ट कर चुके हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अरावली पर्वतमाला पर कोई आंच नहीं आएगी। न्यायालय के आदेश,सरकारी रिकॉर्ड और वैज्ञानिक तथ्य साबित करते हैं कि अरावली सुरक्षित है और आगे भी सुरक्षित रहेगी।

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(Udaipur Kiran)

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