इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने धर्मांतरण के बाद भी एससी का दर्जा रखने के मामले में राज्यव्यापी जांच के निर्देश दिए

–संविधान के साथ धोखाधड़ी, ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं
प्रयागराज, 02 दिसम्बर (Udaipur Kiran) । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में उत्तर प्रदेश की सम्पूर्ण प्रशासनिक मशीनरी को यह सुनिश्चित करने के लिए व्यापक निर्देश जारी किया है कि राज्य में जो लोग ईसाई धर्म अपना चुके हैं, वे अनुसूचित जाति (एससी) के लिए निर्धारित लाभ प्राप्त करना जारी न रखें। न्यायालय ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जाति का दर्जा बरकरार रखना “संविधान के साथ धोखाधड़ी“ है। कोर्ट ने राज्य के सभी जिला मजिस्ट्रेटों को ऐसी घटनाओं की पहचान करने और उन्हें रोकने के लिए कानून के अनुसार कार्य करने हेतु चार महीने की सख्त समय सीमा निर्धारित की है।
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने जितेंद्र साहनी नामक व्यक्ति द्वारा दायर आवेदन को खारिज करते हुए यह निर्देश दिया है। साहनी पर हिंदू देवी-देवताओं का उपहास करने और शत्रुता को बढ़ावा देने का आरोप लगा है। साहनी ने भारतीय दंड संहिता की धारा 153-ए और 295-ए के तहत जारी आरोप पत्र और संज्ञान आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि साहनी ने केवल अपनी भूमि पर “ईसा मसीह के वचनों“ का प्रचार करने की अनुमति मांगी थी और उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है।
न्यायालय ने कहा कि याची ने अपने आवेदन के समर्थन में दायर हलफनामे में अपना धर्म ’हिंदू’ बताया था। जबकि पुलिस जांच में इसके विपरीत तस्वीर सामने आई। गवाह ने गवाही दी थी कि साहनी, जो मूल रूप से केवट समुदाय से थे, ने ईसाई धर्म अपना लिया था और पादरी के रूप में कार्य कर रहे थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गरीब लोगों को प्रलोभन देकर वह हिंदू धर्म के लोगों को ईसाई बनाना चाहते हैं।
गवाह ने आगे आरोप लगाया कि याची ने हिंदू मान्यताओं का मजाक उड़ाया है और ग्रामीणों को हिन्दू धर्म के खिलाफ उन्हें बरगलाया। गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने यह दावा करके हिंदू धर्म का उपहास किया कि जातिगत पदानुक्रम के कारण इसमें कोई सम्मान नहीं मिलता। जबकि ईसाई धर्म अपनाने से नौकरियां मिलेंगी, व्यापार में वृद्धि होगी और ’मिशनरी’ से वित्तीय लाभ होगा।
संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार धर्मांतरित लोगों की कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए, न्यायमूर्ति गिरि ने कहा कि आदेश के पैराग्राफ 3 के तहत, कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म से अलग धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता है।
हाईकोर्ट ने इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का जिक्र करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि केवल लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करना संविधान के साथ धोखाधड़ी और आरक्षण नीतियों के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। हाईकोर्ट ने अक्कला रामी रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के 2025 के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें यह फैसला सुनाया गया था कि कोई व्यक्ति, जो ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गया है और सक्रिय रूप से उसका पालन और अभ्यास करता है, अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं रह सकता है और परिणामस्वरूप उसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने से रोक दिया जाता है।
न्यायालय ने कैबिनेट सचिव (भारत सरकार) और मुख्य सचिव (उत्तर प्रदेश सरकार) को अनुसूचित जातियों के मामले और कानून के प्रावधानों पर गौर करने का निर्देश दिया। इसके अलावा, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति के दर्जे के बीच के अंतर को सख्ती से लागू करने के लिए उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने उत्तर प्रदेश राज्य के सभी जिलाधिकारियों को चार महीने के भीतर कानून के अनुसार कार्य करने का निर्देश दिया है। उन्हें निर्देश दिया गया है कि वे अपनी कार्रवाई की सूचना मुख्य सचिव को दें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनके क्षेत्रों में “संविधान के साथ धोखाधड़ी“ न हो, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है।
याची (साहनी) के संबंध में, न्यायालय ने उनके भ्रामक हलफनामे को गंभीरता से लिया और महाराजगंज के डीएम को तीन महीने के भीतर उनके धर्म की जांच करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने आदेश दिया कि यदि साहनी को जालसाजी का दोषी पाया जाता है, जिसमें उन्होंने ईसाई पादरी होते हुए भी अदालती दस्तावेजों में हिंदू होने का दावा किया है, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि भविष्य में न्यायालय के समक्ष इस तरह के हलफनामे दायर न किए जा सकें। हाईकोर्ट ने साहनी की अर्जी खारिज कर दी।
हालांकि कोर्ट ने उन्हें निचली अदालत में आरोप मुक्ति आवेदन दायर करने का विकल्प खुला छोड़ दिया है।, जिसमें अपनी सभी शिकायतें शामिल थीं, जिनमें यह दलील भी शामिल थी कि प्राथमिकी और जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री में धारा 153ए और धारा 295ए के प्रावधान गायब हैं।
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(Udaipur Kiran) / रामानंद पांडे



