पानी का कुशल उपयोग करने वाली फसल के किस्मों का विकास समय की मांग : डॉ चहल

रांची, 2 दिसंबर (Udaipur Kiran) । प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक और महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के पूर्व कुलपति डॉ एसएस चहल ने वैज्ञानिकों से आग्रह किया है कि वे पानी का कुशल उपयोग करने वाली और उच्च पोषक तत्वों वाली जैव-संवर्धित फसल किस्मों के विकास पर काम करें, ताकि देश में पोषण सुरक्षा की चुनौतियों का सामना किया जा सके।
उन्होंने कहा कि देश अब खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़ चुका है और शोध को दलहन, तिलहन, सब्जियां, फल और मसालों जैसी उच्च गुणवत्ता और उच्च उपयोगिता वाली फसलों पर केंद्रित करने की आवश्यकता है, जिससे किसानों की आय बढ़ सके।
डॉ चहल मंगलवार को बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) की 45 वीं रबी अनुसंधान परिषद की बैठक को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि क्षेत्र विशेष की जरूरतों और समस्याओं पर आधारित और प्रणाली-संवेदनशील शोध की आवश्यकता है, जो व्यावहारिक और क्षेत्र के किसानों के लिए स्वीकार्य हो।
झारखंड में बीज प्रतिस्थापन दर महज 15–20 प्रतिशत
डॉ चहल ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि झारखंड में बीज प्रतिस्थापन दर मुश्किल से 15–20 प्रतिशत है, जबकि पंजाब और हरियाणा में यह 60–70 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में झारखंड को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बीएयू, केवीके और राज्य सरकार की मशीनरी को गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन के लिए एकजुट होना चाहिए। उन्होंने वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे राष्ट्रीय बीज विधेयक में सुधार के लिए अपने सुझाव दें, जो 8 दिसंबर तक सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है और वर्तमान संसद सत्र में पेश किया जा सकता है।
कार्यक्रम में झारखंड सरकार के कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग के विशेष सचिव गोपालजी तिवारी ने वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि राज्य की कृषि को उत्पादन-केंद्रित के बजाय आय-केंद्रित बनाया जाए, क्योंकि झारखंड में कृषक परिवार की औसत आय राष्ट्रीय औसत की लगभग 50 प्रतिशत ही है। कृषि अनुसंधान एवं विकास दृष्टिकोण सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य, आर्थिक रूप से अनुकूल और राजनीतिक रूप से न्यायोचित होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि केवीके वैज्ञानिकों को विशेष फसलों के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए गांवों के समूह विकसित करने चाहिए, जिससे उन जिलों की पहचान बन सके। सचिव ने कहा कि राज्य सरकार ऐसे प्रस्तावों को जमीन पर लाने के लिए हर संभव सहायता देगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारे प्रयास प्रक्रिया-केंद्रित नहीं, बल्कि परिणाम-केंद्रित होना चाहिए।
झारखंड में राष्ट्रीय औसत से कम है बीज प्रतिस्थापन दर : कुलपति
वहीं बीएयू के कुलपति डॉ एससी दुबे ने राज्य में बीज उत्पादन संरचना को मजबूत करने और झारखंड राज्य बीज नीति के क्रियान्वयन की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि झारखंड में दालों की उत्पादकता राष्ट्रीय औसत से अधिक है, जबकि बीज प्रतिस्थापन दर, उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग कम है और सिंचाई सुविधाएं भी सीमित हैं। ऐसे में रबी के दौरान विशेष रूप से धान कटाई के बाद खाली पड़ी भूमि (राइस फॉलो) को दलहन उत्पादन के लिए प्रयोग में लाए जाने की जरूरत है।
अतिथियों का स्वागत करते हुए निदेशक अनुसंधान डॉ पीके सिंह ने प्रमुख शोध उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि बीएयू वैज्ञानिकों की ओर से विकसित अनाज, दलहन, तिलहन और चारा फसलों की 10 किस्में जारी करने के लिए चिह्नित की गई हैं और प्रस्ताव राज्य वेराइटल रिलीज़ कमिटी को भेजा जाएगा।
इस अवसर पर दो प्रगतिशील किसान चतरा के मायराल के नारायण यादव और रांची के लालगुटुवा की संगीता तिग्गाु को अभिनव खेती में विशेष योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का संचालन शशि सिंह ने किया।
इस अवसर पर बीएयू के कई शिक्षक और छात्र सहित अन्य मौजूद थे।
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(Udaipur Kiran) / Vinod Pathak



