Skip to content
Wednesday, 28 October 2026
BREAKING
HEADLINES

व्योमेश चंद्र बनर्जी की जयंती पर खरगे और नसीर हुसैन ने दी श्रद्धांजलि

कांग्रेस के पहले अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी

नई दिल्ली, 29 दिसंबर (Udaipur Kiran) । कांग्रेस के पहले अध्यक्ष और स्वतंत्रता आंदोलन के महान सेनानी व्योमेश चंद्र बनर्जी की जयंती पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राज्यसभा सदस्य सैयद नसीर हुसैन ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। दोनों नेताओं ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बनर्जी के योगदान करते हुए आधीनता के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन के प्रारंभिक शिल्पकार बताया।

कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने कहा कि व्योमेश चंद्र बनर्जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक और पहले अध्यक्ष थे। उन्होंने 1885 में बॉम्बे में कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। उन्होंने नमक कर का विरोध किया और स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया। साथ ही संगठन को मजबूत करने के लिए प्रांतीय समितियों के गठन की वकालत की।कांग्रेस आंदोलन की नींव रखने में उनके अग्रणी योगदान के लिए हम सदैव आभारी हैं।

कांग्रेस सांसद सैयद नसीर हुसैन ने भी श्रद्धांजलि देते हुए लिखा कि बनर्जी एक विशिष्ट न्यायविद और भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के प्रारंभिक शिल्पकार थे। उन्होंने संवैधानिक राजनीति, एकता और लोकतांत्रिक संवाद की नींव रखी। कांग्रेस के शुरुआती दौर में उनके नेतृत्व ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए मंच तैयार किया। उनकी विरासत आज भी हमें सिद्धांत आधारित नेतृत्व, संवैधानिक मूल्यों और सामूहिक राष्ट्रीय आकांक्षा की याद दिलाती है।

उल्लेखनीय है कि व्योमेश चंद्र बनर्जी का जन्म 29 दिसंबर 1844 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उन्होंने लंदन के मिडिल टेंपल से बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त की और भारत लौटकर कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। वे पहले भारतीय थे जो स्टैंडिंग काउंसिल बने और चार बार इस पद पर रहे। 1883 में उन्होंने सुरेंद्रनाथ बनर्जी के अवमानना मामले में पैरवी की। बनर्जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे और 1885 के बॉम्बे अधिवेशन तथा 1892 के इलाहाबाद अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गए। वे ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए चुनाव लड़ने वाले पहले भारतीय भी रहे। महिला शिक्षा के समर्थक बनर्जी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारंभिक चरण में राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत किया। उनके उदारवादी दृष्टिकोण ने संवैधानिक आंदोलन की आधारशिला रखी, जिसने आगे चलकर गोखले और गांधी जैसे नेताओं को प्रेरित किया। साल 1906 में दृष्टि खोने के बाद वे इंग्लैंड चले गए और 21 जुलाई 1906 को लंदन में उनका निधन हुआ।

—————

(Udaipur Kiran) / प्रशांत शेखर

Share

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *